“जनता की सुरक्षा पर समझौता नहीं” — अधिवक्ता पवन तिवारी की प्रखर पैरवी से उच्च न्यायालय का कड़ा प्रहार, सरकार से मांगा ठोस एक्शन प्लान
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- उत्तर प्रदेश
- Updated: 26 February, 2026 14:38
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प्रयागराज, 24 फरवरी 2026।
प्रदेश में बढ़ते बंदर आतंक और मानव–बंदर संघर्ष के गंभीर प्रश्न पर High Court of Judicature at Allahabad ने सख्त रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट शब्दों में जवाबदेह ठहराया है। न्यायालय ने कहा कि केवल भावी कार्ययोजना पर्याप्त नहीं, बल्कि अब तक की गई ठोस कार्रवाई का विस्तृत विवरण शपथपत्र के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए।
इस महत्वपूर्ण जनहित याचिका में अधिवक्ता Pawan Kumar Tiwari की दमदार, तथ्याधारित एवं जनहित-केंद्रित पैरवी ने न्यायालय का ध्यान जमीनी हकीकत की ओर आकृष्ट किया। उनके साथ अधिवक्ता Akash Vashishtha ने भी प्रभावशाली पक्ष रखा।
⚖️ खंडपीठ की तीखी टिप्पणी
मामले की सुनवाई माननीय न्यायमूर्ति Mahesh Chandra Tripathi एवं माननीय न्यायमूर्ति Kunal Ravi Singh की खंडपीठ के समक्ष हुई।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता Manish Goyal उपस्थित रहे, जबकि नगर पालिका परिषद, मुरादनगर की ओर से अधिवक्ता Baleshwar Chaturvedi ने पक्ष रखा।
राज्य ने दलील दी कि रीसस मकाक (बंदर) की जनसंख्या एवं हॉटस्पॉट क्षेत्रों के वैज्ञानिक आकलन हेतु लगभग एक वर्ष का समय अपेक्षित है तथा एक उच्च स्तरीय समिति गठित कर दी गई है।
किन्तु न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि “भविष्य की योजना नहीं, वर्तमान की कार्रवाई बताइए।”
📌 न्यायालय के स्पष्ट आदेश
खंडपीठ ने निर्देश दिया कि—
वर्तमान एस.ओ.पी. के अंतर्गत अब तक उठाए गए ठोस कदमों का विस्तृत ब्यौरा शपथपत्र के रूप में दाखिल किया जाए।
विशेष रूप से गाजियाबाद एवं मथुरा जनपदों में की गई कार्यवाही का विवरण प्रस्तुत किया जाए।
प्रदेश के अन्य जिलों में लागू उपायों का समग्र एक्शन प्लान अगली तिथि से पूर्व न्यायालय के समक्ष रखा जाए।
मामले को 06 अप्रैल 2026 को पुनः सूचीबद्ध किया गया है।
🏛️ पवन तिवारी की कानूनी पहल से बढ़ी प्रशासनिक जवाबदेही
अधिवक्ता पवन कुमार तिवारी की सक्रिय पहल और ठोस तथ्यों पर आधारित पैरवी को इस आदेश की निर्णायक शक्ति माना जा रहा है। उन्होंने न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न दृढ़ता से रखा कि जब नागरिकों की सुरक्षा प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रही है, तब केवल समितियों और सर्वेक्षणों का हवाला पर्याप्त नहीं हो सकता।
यह आदेश प्रशासनिक तंत्र के लिए स्पष्ट संदेश है—
जनता की सुरक्षा सर्वोपरि है, और जवाबदेही से कोई समझौता नहीं।
अब प्रदेश की निगाहें 06 अप्रैल की सुनवाई पर टिकी हैं, जहाँ सरकार को अपने दावों को ठोस कार्यवाही के रूप में सिद्ध करना होगा।
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