Tuesday 12 May 2026 16:25 PM

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अब ममता को याद आयी विपक्षी दलों की !

ममता बनर्जी की विपक्षी एकता में कांग्रेस और वामदल खास दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं.


कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों की याद आई है. 2024 के लोकसभा चुनाव और 2026 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की तरफ से तमाम प्रयास किए जाने के बाद भी पश्चिम बंगाल में एक भी सीट छोड़ने को तैयार नहीं होने वाली ममता बनर्जी की पार्टी अब जब वह 80 सीटों पर सिमट गई हैं तो उन्हें विपक्षी एकता की याद आई है. 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान एक से दो सीटों पर भी समझौता करने को तैयार कांग्रेस को ममता ने कोई तवज्जो नहीं दी थी. दिलचस्प बात यह है कि ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन का हिस्सा रही, लेकिन कांग्रेस को जरा भी भाव नहीं दिया.




ममता चाहती हैं विपक्षी एकता पर विपक्षी दल तैयार नहीं

अब बंगाल का चुनाव बुरी तरह हारने के बाद ममता बनर्जी ने विपक्षी दलों को साथ लाने की कोशिश की हैं तो उन्हें बड़ा झटका लगा है। कई प्रमुख दलों ने तृणमूल कांग्रेस से दूरी बना ली है।


सबसे बड़ा झटका वाम दलों की ओर से मिला। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने बीजेपी के खिलाफ टीएमसी के साथ किसी भी तरह के राजनीतिक समझौते से साफ इनकार कर दिया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य वाम सहयोगी दलों ने भी यही रुख अपनाया।


कांग्रेस ने भी ममता बनर्जी के साथ खुलकर आने से परहेज किया। कांग्रेस की राज्य इकाई ने फिलहाल टीएमसी से दूरी बनाए रखी है। राज्य के कई विपक्षी दल टीएमसी पर भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगा रहे हैं। इससे ममता बनर्जी की राजनीतिक मुश्किलें और बढ़ गई हैं।


हार के बाद टीएमसी में उभरा घरघोर असंतोष

पार्टी के भीतर भी असंतोष के संकेत मिल रहे हैं। वरिष्ठ टीएमसी नेता निर्मल घोष ने नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी की रणनीतियों ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। इन घटनाक्रमों को ममता बनर्जी की विपक्षी एकजुटता की योजना के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। फिलहाल टीएमसी राजनीतिक रूप से पहले से अधिक अलग-थलग नजर आ रही है।


कांग्रेस से झगड़ा मोल लेना ममता बनर्जी को पड़ा महंगा

2026 बंगाल चुनाव के रिजल्ट पर नजर डालें तो पता चलता है कि कांग्रेस का खास तवज्जो नहीं देना ममता बनर्जी को भारी पड़ा है. भले ही चुनाव रिजल्ट आने के बाद कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी फोन कर ममता बनर्जी के प्रति सहानुभूति जताई, लेकिन वोट गणित देखने पर असली कहानी बयां होती है.


उदाहरण के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव में टीएमसी का बंगाल में स्ट्राइक रेट 70 फीसदी रहा, जिसमें ममता बनर्जी की पार्टी के 29 सांसद जीते. ममता लग रहा था कि बंगाल में करीब 26-27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं. इसके अलावा 70 फीसदी हिन्दूओं में करीब 35 फीसदी महिलाएं हैं, तो उसमें से करीब ममता को सपोर्ट करती रही हैं. ऊपर से इस बार ममता सरकार कई योजनाओं के जरिए महिलाओं के बैंक अकाउंट में डायरेक्ट रुपये ट्रांसफर कर रही थीं. ऐसे में ममता बनर्जी की पार्टी अंकगणित लगाकर बैठी थी कि अगर 27+17+ 5 फीसदी हिंदू पुरुषों को वोट मिलता है तो वह आसानी से चुनाव जीत जाएंगे, जो कि पिछले चुनावों में भी देखने को मिला था.


कांग्रेस और हुमायूं कबीर ने फेल किया टीएमसी का अंकगणित

लेकिन टीएमसी वालों का अंकगणित कहां फेल हुआ इसे आइए कुछ उदाहरणों से समझते हैं. बेलडांगा विधानसभा सीट मुस्लिम बाहुल्य है. कोई सोच ही नहीं सकता है कि बीजेपी कभी इस सीट से जीत पाएगी, लेकिन 2026 के चुनाव में ऐसा हुआ. बीजेपी उम्मीदवार भरत कुमार इस सीट से विधायक चुने गए. इस सीट पर बीजेपी का वोट शेयर पिछले चुनाव से केवल तीन फीसदी बढ़ा है. 2021 के चुनाव में बेलडांगा सीट पर टीएमसी को 55 फीसदी वोट मिले थे. इस बार घटकर करीब 26 फीसदी पर आ गया. वहीं कांग्रेस का वोट शेयर 13 से बढ़कर 17 फीसदी पर चला गया. वहीं हुमायूं कबीर ने इस पर करीब 20 फीसदी वोट कांटे.



स्पॉन्सर किया गया

पूरे बंगाल चुनाव में कांग्रेस के 29 उम्मीदवारों ने 20 हजार से ज्यादा वोट हासिल किए हैं. इन 29 में 23 प्रत्याशी मुसलमान हैं. वहीं मुस्लिम बाहुल्य सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाली हुमायूं कबीर की पार्टी के प्रत्याशियों ने 23 सीटों पर 10 हजार से ज्यादा वोट पाए हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव में 31 में से टीएमसी ने 30 सीटें जीती थी. वहीं इस बार हुमायूं कबीर के चलते टीएमसी को काफी नुकसान हुआ है.


इसी तरह की तस्वीर मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर दीनाजपुर, साउथ 24 परगना, नॉर्थ 24 परगना जैसे मुस्लिम बाहुल्य जिलों में देखने को मिला है. इन उदाहरणों से साफ पता चलता है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में मुस्लिम वोटों का जबरदस्त बंटवारा टीएमसी, कांग्रेस, वामदल और हुमायूं कबीर के उम्मीदवारों के बीच देखने को मिला. अब हार मिलने के बाद ममता बनर्जी को समझ में आ रहा है कि कांग्रेस को तवज्जो नहीं देना और हुमायूं कबीर को नहीं मनाना उनके लिए कितना भारी पड़ा है. अब जब हार मिलने के बाद ममता बनर्जी विपक्षी एकता की बातें कर रही हैं, तो ये तमाम दल इनके साथ आने से परहेज करते दिख रहे हैं

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